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Saturday, 3 December 2011

sanvedna ki khamoshi

संवेदना की खमोशी प्रभा जैन निरीह मानव संवेदनाओं की वेदी पर बेबसता ही दिखती है। सरसता का बोघ तो जैसे लुप्त हो गया कहीं किसी की हल्कीस आहट भी
संवेदना को झकझोर देती है। संवेदना की चित्कादर मानो
मन व आत्मा के प्रत्येाक ताल पर अपनी छाप छोड जाती है। मन बूदं बूद रोशनी को तरसता बिखरते जुगनुओं में अपनी चमक ढूढता परछाई के उस छार तक स्वंईय को ही बहलाने का निरर्थ्क‍ प्रयास करता। हवा स्या‍ह और मटमैली होकर मन ही के ईद्र गिर्द घूम रही थी
आकुलमन अपनी ही जिजीविशा में सख्तीन से संवेदना को दबाने का खामोशी से प्रयास कर रहा था। मन की लहरें कुहासे में परिणत होकर गहरा गयी थी संवेदना की खामोशी आज अजनबी थी। 16(311 शास्त्री नगर खटोदरा कालोनी सूरत-2 9723544153

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