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Saturday, 3 December 2011
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kavita prabha jain
बेटों की बेवफाई
प्रभा जैन
क्यूं बांट रहे हो मरे अस्तित्व को
मरे प्यार को मेरे वजूद को
क्याप तुम्हें ख्यािल नहीं
क्याप मरा हाल है
दिल पल पल हो रहा बेहाल है
क्यूंल सदियों से
वही लोहा पीट रहे हो
मरे वजूद को घसीट रहे हो
मरा मन बिखरता है
तार तार होकर अखरता है
बेबसी में वो
तडपकर चीखता है रोता है
नहीं जानते तुम मेरी तन्हारई को
मजाक बना दिया
मरी खामोशी को
सारी कायनात मिलकर भी
मरे पिघलते हुए आंसुओं की
टीस नहीं समझ सकते।
क्यान कभी कोइ्र बेटा
जान या समझ पायेगा
मरी जगहंसाई को।
आंसुओं से किताबें नहीं लिखी जाती
जिन्दंगी कागज की लिखई नहीं होती।
बंदूक की गोली
हर लेती है जिन्द गी
क्याे कोई रोक सकेगा
इतिहास की गवाही को।
जीवन में कई तूफान
अभी आने बाकी हैं
एक की लाश
दूजे की जिन्दहगानी है
मौत के सौदागरों ने---
मिलकर हस्तीग मिटा घली
क्यार मां भूला पायेगी
बेटों की बेवफाई को।
प्रभा जैन
16(311 शास्त्री नगर
खटोदरा कालोनी सूरत-2
9723544153
प्रभा जैन
क्यूं बांट रहे हो मरे अस्तित्व को
मरे प्यार को मेरे वजूद को
क्याप तुम्हें ख्यािल नहीं
क्याप मरा हाल है
दिल पल पल हो रहा बेहाल है
क्यूंल सदियों से
वही लोहा पीट रहे हो
मरे वजूद को घसीट रहे हो
मरा मन बिखरता है
तार तार होकर अखरता है
बेबसी में वो
तडपकर चीखता है रोता है
नहीं जानते तुम मेरी तन्हारई को
मजाक बना दिया
मरी खामोशी को
सारी कायनात मिलकर भी
मरे पिघलते हुए आंसुओं की
टीस नहीं समझ सकते।
क्यान कभी कोइ्र बेटा
जान या समझ पायेगा
मरी जगहंसाई को।
आंसुओं से किताबें नहीं लिखी जाती
जिन्दंगी कागज की लिखई नहीं होती।
बंदूक की गोली
हर लेती है जिन्द गी
क्याे कोई रोक सकेगा
इतिहास की गवाही को।
जीवन में कई तूफान
अभी आने बाकी हैं
एक की लाश
दूजे की जिन्दहगानी है
मौत के सौदागरों ने---
मिलकर हस्तीग मिटा घली
क्यार मां भूला पायेगी
बेटों की बेवफाई को।
प्रभा जैन
16(311 शास्त्री नगर
खटोदरा कालोनी सूरत-2
9723544153
sanvedna ki khamoshi
संवेदना की खमोशी प्रभा जैन निरीह मानव संवेदनाओं की वेदी पर बेबसता ही दिखती है। सरसता का बोघ तो जैसे लुप्त हो गया कहीं किसी की हल्कीस आहट भी
संवेदना को झकझोर देती है। संवेदना की चित्कादर मानो
मन व आत्मा के प्रत्येाक ताल पर अपनी छाप छोड जाती है। मन बूदं बूद रोशनी को तरसता बिखरते जुगनुओं में अपनी चमक ढूढता परछाई के उस छार तक स्वंईय को ही बहलाने का निरर्थ्क प्रयास करता। हवा स्याह और मटमैली होकर मन ही के ईद्र गिर्द घूम रही थी
आकुलमन अपनी ही जिजीविशा में सख्तीन से संवेदना को दबाने का खामोशी से प्रयास कर रहा था। मन की लहरें कुहासे में परिणत होकर गहरा गयी थी संवेदना की खामोशी आज अजनबी थी। 16(311 शास्त्री नगर खटोदरा कालोनी सूरत-2 9723544153
संवेदना को झकझोर देती है। संवेदना की चित्कादर मानो
मन व आत्मा के प्रत्येाक ताल पर अपनी छाप छोड जाती है। मन बूदं बूद रोशनी को तरसता बिखरते जुगनुओं में अपनी चमक ढूढता परछाई के उस छार तक स्वंईय को ही बहलाने का निरर्थ्क प्रयास करता। हवा स्याह और मटमैली होकर मन ही के ईद्र गिर्द घूम रही थी
आकुलमन अपनी ही जिजीविशा में सख्तीन से संवेदना को दबाने का खामोशी से प्रयास कर रहा था। मन की लहरें कुहासे में परिणत होकर गहरा गयी थी संवेदना की खामोशी आज अजनबी थी। 16(311 शास्त्री नगर खटोदरा कालोनी सूरत-2 9723544153
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