बेटों की बेवफाई
प्रभा जैन
क्यूं बांट रहे हो मरे अस्तित्व को
मरे प्यार को मेरे वजूद को
क्याप तुम्हें ख्यािल नहीं
क्याप मरा हाल है
दिल पल पल हो रहा बेहाल है
क्यूंल सदियों से
वही लोहा पीट रहे हो
मरे वजूद को घसीट रहे हो
मरा मन बिखरता है
तार तार होकर अखरता है
बेबसी में वो
तडपकर चीखता है रोता है
नहीं जानते तुम मेरी तन्हारई को
मजाक बना दिया
मरी खामोशी को
सारी कायनात मिलकर भी
मरे पिघलते हुए आंसुओं की
टीस नहीं समझ सकते।
क्यान कभी कोइ्र बेटा
जान या समझ पायेगा
मरी जगहंसाई को।
आंसुओं से किताबें नहीं लिखी जाती
जिन्दंगी कागज की लिखई नहीं होती।
बंदूक की गोली
हर लेती है जिन्द गी
क्याे कोई रोक सकेगा
इतिहास की गवाही को।
जीवन में कई तूफान
अभी आने बाकी हैं
एक की लाश
दूजे की जिन्दहगानी है
मौत के सौदागरों ने---
मिलकर हस्तीग मिटा घली
क्यार मां भूला पायेगी
बेटों की बेवफाई को।
प्रभा जैन
16(311 शास्त्री नगर
खटोदरा कालोनी सूरत-2
9723544153
Saturday, 3 December 2011
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